जब मेरे नन्हे शौर्य के मुख पर प्यारी एक मुस्कान उभरती है, तो पत्ता पत्ता लहलहा उठता है, हवा भी गुनगुनाने लगती है, वातावरण सुरमय हो जाता है, मधुर स्वर गूंजने लगते हैं - खामोशी भी खिलखिला देती है एवं ठहाके लगाने लगती है। जब मेरे नन्हे शौर्य के मुख पर प्यारी एक मुस्कान उभरती है, कंवल दिल के खिल उठते हैं, हवा खुशगवार सी लगने लगती है, संपूर्ण सृष्टि महक उठती है एवं हर तरफ़ एक जादू फैल जाता है - खामोशी भी खिलखिला देती है और ठहाके लगाने लगती है। जब मेरे नन्हे शौर्य के मुख पर प्यारी एक मुस्कान उभरती है, बेखुदी हद्द से गुज़र जाती है, आसपास की खबर नहीं रहती है, श्वास श्वास में एक अनोखा सा, अनूठा सा अनुभव होता है - खामोशी भी खिलखिला देती है और ठहाके लगाने लगती है।
Tuesday, May 14, 2013
कविता - मुस्कान मेरे नन्हे शौर्य की (Shaurya is my Grandson)
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नजम - सवालिया निशान
खुदा है या नहीं, यह सवाल अक्सर हम उठाते हैं, बनाकर इस को मौज़ूं नित नई नशिस्त जमाते हैं, वोह है तो कायनात है, वोह नहीं तो कुछ भी नहीं - कम-ज़र्फ़ हैं वोह जो यह भी नहीं समझ पाते हैं। ये सवालिया निशान जो उसके वजूद पर लगाते हैं, ये सवालिया निशान लेकिन तब कहां चले जाते हैं, जब हर खुशी का सिला तो हम खुद को दे देते हैं - और हर हादसे को भगवान की रज़ा हम बताते हैं। मैंने यह किया, मैंने वोह किया, यही रट लगाते हैं, देके नाम अना का एहसास-ए-कमतरी को छुपाते हैं, उसकी बेआवाज़ लाठी बोलती है तो अना खो जाती है - फिर भागते हैं मंदिर और मस्जिद, रूठे रब्ब को मनाते हैं।
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नजम - गीता ज्ञान - कर्म किए जाओ, फल मुझ पर छोड़ दो
मैं अपने हाथ में तकदीर द्वारा लिखित लकीरों का जायज़ा लगाता हूं, आज तक मैंने ज़िंदगी में क्या खोया, क्या पाया, बही खाता बनाता हूं, लोग कहते हैं जो तकदीरों में नहीं लिखा होता वोह तदबीरें दिला देती हैं - तकदीर की बंदिशों में बंधा रह के मैं अपनी तदबीरों में खो जाता हूं। तकदीर की लकीरों में मैं अपने पूर्व जन्म का बकाया लेके आता हूं, और तदबीरों की मार्फ़त कर्मभूमि में अपने दांव पेच मैं आजमाता हूं, यूं भी कहा गया है कि सब कुछ उसी की रज़ा से ही तो मिलता है - भगवान की रज़ा एवं अपनी कर्म शक्ति के तालमेल को आजमाता हूं। यह खेल तकदीरों का है या कि तदबीरों का, यहां मैं उलझ जाता हूं, उसकी रज़ा के मुकाबिले अपनी कार्मिक क्षमता को ना-माकूल पाता हूं, फिर मुझे रौशनी का एक जज़ीरा "गीता ज्ञान" के रूप में नज़र आता है - और मैं अपने कर्म क्षेत्र में जुटकर नतीजे को उसकी रज़ा पर छोड़ देता हूं।
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Thursday, March 7, 2013
नज़म - शर्म-औ-हया
यह खेल तदबीरों का है या कि मेरे हाथों की लकीरें रंग दिखाती हैं, रास्ते सभी सहज लगते हैं और मंज़िलें ठीक सामने नज़र आती हैं, पर कभी कभी मंज़िल तक आके भी हाथ से बाज़ी निकल जाए है - मज़िलों के मील पत्थर तक पहुंचने में मंज़िलें आगे खिसक जाती हैं। हसरतें दिल की हसीन नज़ारे उनकी निगाहों से चुराने को जाती हैं, जैसे ही नज़रें मिलने को होती हैं तो उनकी नज़रें नीची हो जाती हैं, ये उनके अंदाज़-ए-शर्म-औ-हया हैं या ज़ुल्म-औ-सितम की कोई अदा - कुछ भी हो हसरतें अपने दिल की तो दिल में ही दफ़न हो जाती हैं। सवाल किया जब हमने उनसे यही तो लज्जा से वोह नज़रें फेर जाती हैं, सिर को झुका लेती हैं और ज़ुबान अपनी से कुछ भी नहीं बोल पाती हैं, ज़ुबान से चाहे वोह कुछ भी ना कहें पर निगाहें सब साफ़ कह देती हैं - और हम सब समझ जाते हैं, अनकही बातें सब खुद ही बयां हो जाती हैं।
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नज़म - तक्मील-ए-ग़ज़ल
लाखों ग़मों को निचोड़कर जो एक लड़ी में पिरो दें तो तक्मील-ए-ग़ज़ल होती है, झूठ-औ-सच को समेटकर एक दिलनशीं अंदाज़ दे दें तो तक्मील-ए-ग़ज़ल होती है, चार दिन की ज़िंदगी हमें जो मिलती है, उसे कौन समझा है, कौन उसको जाना है - गुनाह एवं सवाब को मानीखेज अल्फ़ाज़ में ढाल दें तो तक्मील-ए-ग़ज़ल होती है। शोख़ नज़रें जो मिल जाती हैं शोख़ नज़रों के संग तो तक्मील-ए-ग़ज़ल होती है, नज़रों के चार होने के बाद दो दिल मिलते हैं जब तो तक्मील-ए-ग़ज़ल होती है, पर दिल-ए-बेताब तड़प उठता है जब दर्द से तो बेनूर हो जाती हैं नूर से भरी आंखें - दिल और आंखों में जब इस कदर तालमेल होता है तो तक्मील-ए-ग़ज़ल होती है। आंखों से टपके मोती जब रुख्सार पर आ जाते हैं तो तक्मील-ए-ग़ज़ल होती है, बिना टपके यही मोती जब कल्ब में पहुंच जाते हैं तो तक्मील-ए-ग़ज़ल होती है, कल्ब में पहुंचकर ये मोती अंगारे बन जाते हैं तो दिल बेचारा तो बिखर जाता है - जज़्बात अल्फ़ाज़ बनकर कागज़ पे उतर जाते हैं तो तक्मील-ए-ग़ज़ल होती है।
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Tuesday, February 19, 2013
नज़म - दोधारी तलवार
ज़िक्र जब भी करोगे अपनी बेबसी का ग़ैरों से, लोग बेवजह अफ़साने बनाएंगे, तुम क्या समझते हो कि ये दुनियां वाले जज़बा-ए-हमदर्दी से पेश आएंगे, लोग तो महज़ तमाशबीन होते हैं, हर सू तलाश करते हैं मौका-ए-तानाज़नी - तवक्को इनसे खैरख्वाही की फ़िज़ूल है, ये तो तुम पर ही उंगलियां उठाएंगे। मर जाओगे, मिट जाओगे रहनुमाई करते करते, इल्ज़ाम ये तुम्ही पर लगाएंगे, बिक जाओगे, मुफ़लिसी ज़ेवर बन जाएगी तुम्हारा, बेईमान ये तुम्हें बताएंगे, वक्त आने पर ये तो बापू को भी नहीं बख्शते, तुम्हारी तो बिसात ही कुछ नहीं है - जश्न-ए-जीत को मनाना तो इनकी जागीर है, हार में तुम्ही को दोषी ठहराएंगे। बच के निकल जाओ इनकी शतरंजी चालों से, ना जाने ये क्या कयामत बरपाएंगे, जीना तो एक तरफ़, मरना भी मुहाल होगा जब इनके ज़ुल्म-औ-सितम रूबरू आएंगे, तलवार की तो एक तरफ़ धार होती है, बेरहम दुनियां के दोनों तरफ़ धार होती है - बेरुखी इनकी है कहर के मानिंद, इनकी रहमतों में भी जाती मफ़ाद नज़र आएंगे।
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नज़म - डिनर एक ग़रीब का
जाने कैसे आज एक अमीर व्यक्ति ने सोए हुए अपने ज़मीर को जगाया, एक अत्यंत ही ग़रीब व्यक्ति को अपने घर पर उस ने डिनर पर बुलाया, स्वयं अपने हाथों से अमीर व्यक्ति ने ग़रीब व्यक्ति का हाथ मुंह धुलवाया, और एक बहुत बड़े से डाइनिंग टेबल पर अति प्रेम से उस को बिठाया। छ्त्तीस प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों से उसने अपने दस्तरखान को सजाया, उस सजे सजाए दस्तरखान को देखकर उस ग़रीब का मन तो भर्माया, पर रोज़ की आदत के अनुसार उसने रोटी के साथ एक प्याज़ को उठाया, हर्ष से अत्यंत ही उल्लासित होकर उसने उस डिनर का आनंद उठाया। भोजन के उपरांत प्रसन्न हो ग़रीब व्यक्ति ने उसे अपनी दुआओं से हर्षाया, ग़रीब व्यक्ति की भावभीनि मुद्रा देखकर अमीर व्यक्ति का मन तो भर आया, ग़रीब व्यक्ति को अति संतुष्ट पाकर उस में उसको शाह-ए-जहां नज़र आया, उस ग़रीब के सम्मुख उसने स्वयं को सारी दुनियां में सबसे तुच्छ पाया।
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Monday, January 28, 2013
कविता - कारण दामिनी की मृत्यु का
मेरे साथ जो हादसा हो गया, उससे देश की जनता के आक्रोश का तो कोई अंत ना था, मैं तो स्वयं ही दुःखी थी पर जनता को पीड़ित देख कर मेरी पीड़ा का भी अंत ना था। जनता की मुजरिमों के लिए मृत्युदंड की मांग तो जायज़ थी पर जनता का यह फैसला, देश के हुकुमुरानों, कानूनदानों और मुंसिफ़ों के लिए एक गंभीर समस्या से कम ना था। हालांकि आक्रोश की तो उनमें भी कमी न थी पर मौजूदा कानून में उनके हाथ बंधे थे, क्योंकि मौजूदा कानून में बलात्कार के जुर्म के लिए मृत्युदंड का कोई प्रावधान ना था। उनके बंधे हाथ देख मुझे क्रोध भी आ रहा था पर उनके हाल पर रहम भी आ रहा था, लेकिन अपराधियों को वांछित सज़ा ना मिल पाए यह भी मेरे मन को गवारा ना था। हालांकि मैंने अपने भाई से स्पष्ट कहा था कि मैं मरना नहीं चाहती, जीना चाहती हूं, पर बहुत ही सोच समझकर मैंने एक फैसला लिया जो कि मेरे लिए आसान ना था। मैंने रब्ब से अपने लिए मौत मांग ली और रब्ब नें मेरी मंशा समझकर मान भी ली, अब हुकुमुरानों, कानूनदानों और मुंसिफ़ों के लिए इंसाफ़ करना कोई मसला ही ना था। कारण यह कि अब तक वोह बलात्कार को ही मृत्युदंड के तराज़ू में तोलते आ रहे थे, मेरी मृत्यु से आरोपी क़त्ल के मुजरिम थे, अब उन्हें मृत्युदंड देना मुश्किल ना था।
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Wednesday, December 26, 2012
कविता - दामिनी के मुजरिमों की सज़ा
बलात्कार के अपराध के दोषियों लिए मात्र मौत की सज़ा ही उपयुक्त हो सकती है, इतने जघन्य कृत्य के लिए इसके अतिरिक्त और कोई सज़ा भी क्या हो सकती है, मग़र मैं एक ऐसा प्रश्न खड़ा कर रहा हूं जिसपर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है - इनकी तथाकथित मृत्यु के पश्चात इनकी अस्थियों की क्या नियति हो सकती है? ये लोग जो कि पूर्णतयः दुष्चरित्र हैं इनकी अस्थियां भी तो पवित्र नहीं हो सकती हैं, उन्हें समुद्र में प्रवाह करें तो भविष्य में वो सुनामी जैसी विपदा का रूप ले सकती हैं, उन्हें ज़मीन में गाड़ें तो भविष्य में भूकंप जैसी परिस्थितियों का जन्म हो सकता हैं - उन्हें वातावरण में विसर्जित करें तो वो सम्पूर्ण वातावरण को दूषित कर सकती हैं। अगर ऐसा सब कुछ करने से ऐसी अमानवीय परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं, ऐसी परिस्थितियां जो कि सम्पूर्ण मनुष्य जाति के लिए हानिकारक हो सकती हैं, तो उचित यही होगा कि मृत्युपरांत इनकी लाशें जंगली जानवरों को सौंप दी जाएं - मनुष्य जाति की हानि भी ना हो और ये किसी के लिए लाभकारी भी हो सकती हैं।
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12:50:00 PM
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Wednesday, December 19, 2012
नज़म - जज़्बा-ए-वफ़ा
दोस्ती नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, प्यार पैग़ाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, हर खुशी में जज़्ब है जज़्बा-ए-वफ़ा - मोहब्बत नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का। खुशबू से नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, सतरंग से नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, सात सुरों का संगम है जज़्बा-ए-वफ़ा - नाम है मौसीकी जज़्बा-ए-वफ़ा का। ईमान नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, ऐतमाद नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, आदमी का वजूद है जज़्बा-ए-वफ़ा - अख़्लाक नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का। इन्सानियत नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, रूहानियत नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, हकीकतन हर शै में है जज़्बा-ए-वफ़ा - कायनात है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का। पाकीज़गी से है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का, खुलूस से तो है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का, पैदा करो तो सही अपने अंदर जज़्बा-ए-वफ़ा - एहसास से ही तो नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का। इनायत नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, करम नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, हर फ़ल्सफ़े का निचोड़ है जज़्बा-ए-वफ़ा - अकीदत नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का। रिज़्क नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, बरकत में है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का, हर एक नायाब शै में है जज़्बा-ए-वफ़ा - शान-औ-शौकत में है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का। गुरूग्रंथ-औ-गीता में है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का, बाइबल नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, हर इल्म-औ-सुखन में है शुमार जज़्बा-ए-वफ़ा - कुरान में है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का। पारसाई में है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का, राअनाई में है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का, बहुत ही बड़ी जागीर है जज़्बा-ए-वफ़ा - खुदाई नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का। राम और रहीम नाम है जज़्बा-ए-वफ़ा का, नानक एवं ईसा में है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का, हर पयम्बर के पैग़ाम में है जज़्बा-ए-वफ़ा - रब्ब में मौजूद है नाम जज़्बा-ए-वफ़ा का।
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Saturday, December 15, 2012
नज़म - माथे पे त्योरी
जनाब-ए-वाला, आपसे इश्क ही तो किया है, आप माथे पे त्योरी चढ़ाते क्यों हो, जनाब-ए-वाला, कोई गुनाह तो नहीं किया है, आप माथे पे त्योरी चढ़ाते क्यों हो। इश्क हो जाए किसी को किसी से, क्या यह कहीं किसी के बस में हुआ करता है, हमारे भी बस से बाहर था जो हमने किया है, आप माथे पे त्योरी चढ़ाते क्यों हो। कौन किसी के काबिल है और कौन किसी के काबिल नहीं है, खुदाई देन है इश्क, यह खुदाई देन हमें मिली है तो हमने किया है, आप माथे पे त्योरी चढ़ाते क्यों हो। इश्क रुतबा, मयार, मज़हब और ज़ातपात कभी नहीं पूछा करता, सिर्फ़ हो जाता है, हमें भी बस हो गया है इश्क तो हमने किया है, आप माथे पे त्योरी चढ़ाते क्यों हो। लगता है कि हमारी बातों से आप मुतमइन हो गए हो जो मंद मंद मुस्कुरा रहे हो, हमने आपको मुतमइन कर ही दिया है तो फिर आप माथे पे त्योरी चढ़ाते क्यों हो।
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2:58:00 PM
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नज़म - खून का रिश्ता
कल रास्ते में फ़रीद साहब मिल गए, मिलकर उनको तो मन मेरा हर्षाया, मेरे एक दोस्त मेरे साथ थे, उनसे फ़रीद साहब का मैंने मिलाप करवाया, मैंने दोस्त को बताया कि फ़रीद साहब के साथ तो खून का रिश्ता है मेरा - मेरे दोस्त हैरान थे कि फ़रीद साहब से खून का रिश्ता मेरा कैसे हो पाया। मैंने कहा कि ज़माने की रस्मों ने मुझे हिंदु और उन्हें मुसलमां बनाया, लेकिन उनके इंसानी अख़्लाक ने उनके साथ मेरा खून का रिश्ता बनाया, कल हस्पताल में जब मैं ज़िंदगी-औ-मौत की जद्द-औ-जहद कर रहा था - तो फ़रीद साहब ने अपना खून देकर मेरी ज़िंदगी को नया जामा दिलाया। तख़्लीक-ए-कायनात के दौरान यजदां ने तो सबको फ़क्त इन्सां बनाया, लेकिन दुन्यावी रिवायतों ने उन्हें हिंदु, सिख, इसाई-औ-मुसलमां बनाया, तोड़ दो इन मज़हबी दीवारों को और कायम करो सबसे ऐसा एक रिश्ता - जो परे हो इन रिवायतों-औ-दीवारों से जैसे सहरा में हो इक ग़ुल खिलाया।
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Saturday, December 8, 2012
नज़म - मेरी कलम
बहुत रोका, बहुत टोका मैंने अपनी कलम को पर वोह अपनी करनी से बाज़ नहीं आई, किस्सा-ए-हकीक़त-ए-हाज़िरा को ज़माने में आम करने में उस ने ज़रा भी देर नहीं लगाई, पूरे का पूरा हर्फ़-ए-अमल वोह फ़र्राटे से लिखती आई और ज़रा भी बुज़दिली नहीं दिखाई, पर ज़माने मे चोरी, लूट, खसोट, बदमाशी, गुंडागर्दी व दहशतगर्दी मे कोई कमी नहीं आई। चोर हो, भाई हो या नेता, आपस में सभी एक हैं, यह लिखने में वोह ज़रा भी नहीं घबराई, इस ज़माने में कोई भी इदारा ले लो, इन सभी कुकृत्यों से अछूता वोह ज़रा भी नहीं पाई, ज़माने की जुबान पर ताले लगे हैं तो क्या, कलम नें अपनी कथनी में कमी नहीं दिखाई, जो चोर और पोलीस आपस में हैं भाई भाई, नेता व भाई के रिश्ते में भी कमी नहीं आई। सुनो, कान खोलकर, सुनो, यह आवाम की ही पुरज़ोर आवाज़ है जो कलम नें है यहीं उठाई, देखो, आंखें खोलकर, देखो, शीशे में तुम्हारी अपनी ही सूरत है जो कलम नें है यहीं दिखाई, बोलो, मुहं खोलकर, बोलो, यही तो हकीकत-ए-हाज़िरा है जो कलम नें तुम्हें है यहीं समझाई, बापू के तीन बंदर ही बनकर मत रह जाओ वरना कहोगे कि तुमने है मुंह की यहीं खाई।
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4:09:00 PM
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नज़म - आप मिलो तो सही
साथ आपका अगर रहे तो दोंनों जहां हम भुला देंगे, आप मिलो तो सही, इस जहां के अंदर ही इक नया जहां हम बसा लेंगे, आप मिलो तो सही। ज़िंदगी के सफ़र में एक हमसफ़र का साथ होना निहायत ही लाज़मी है, हमसफ़र बन जाओ, आपको दिल में हम सजा लेंगे, आप मिलो तो सही। आप अगर साथ देने का वादा करो तो फिर इस ज़माने का हमें क्या डर, तमाम दुनियां की मुखालफ़त झेलकर हम भुला देंगे, आप मिलो तो सही। वफ़ा परस्ती हमारा शोबा और इकरार-ए-वफ़ा शौक़ आपका तो क्या ग़म, ग़ैरों से हमें मतलब क्या, एक दूजे से हम निभा लेंगे, आप मिलो तो सही। सादादिली हमारी तो जगज़ाहिर है, यह एक ही नज़र में आप जान जाओगे, आंखों ही आंखों में बात दिल की आपको हम बता देंगे, आप मिलो तो सही। एक बहुत ही मशहूर कहावत है जग में कि एक हाथ दूसरे हाथ को धोता है, आप और हम दोनों मिल जाएं तो सब ग़म मिटा देंगे, आप मिलो तो सही। लबों पर हो आराइश हंसी की और फूलों की मानिंद मुस्कुराहट हो चेहरे पर, फिर देखो, आपकी खातिर जान तक भी हम लुटा देंगे, आप मिलो तो सही।
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नज़म - ईमानदारी के जरासीम
कल एक पुराने दोस्त मिल गए, बेचारे बहुत ही खस्ता हाल में नज़र आते हैं, हालांकि यह महाशय आयकर कार्यालय में इंस्पैक्टर के ओहदे से जाने जाते हैं, मैंने कुरेदा, "अरे भाई, यह क्या हालत बना रखी है, आप कुछ लेते क्यों नहीं - आपके कार्यालय में तो सभी लेते हैं और दोनों हाथों से दौलत समेटे जाते हैं"। कहने लगे, "बात तो आपकी ठीक है, ये वोह अपनी मजबूरी में करते जाते हैं, और मैं मजबूर हूं आप अपनी मजबूरी से, मेरे हालात उनसे अलग हो जाते हैं", मैंने कहा, "तुम्हारे हालात उनसे अलग हो जाते हैं, यह बात कुछ समझा नहीं" - बोले, "लेने-देने की बात होती है तो मां-बाप द्वारा दिए संस्कार आढ़े आ जाते हैं"। मैंने कहा, "यह क्या कहते हैं आप? मां-बाप द्वारा दिए संस्कार आढ़े आ जाते हैं, अरे दोस्त, आयकर कार्यालय में कार्यरत होकर संस्कार आपके आढ़े आ जाते हैं, आप तो एक अजूबा हो, भाई, आपको देखने के लिए तो टिकट ही लगानी पड़ेगी" - हंसकर बोले,"मैं क्या करूं, दोस्त, मेरे अंदर ईमानदारी के जरासीम घुस जाते हैं"।
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नज़म - रूदाद-ए-ग़म-ए-दिल
मुद्दतों दुनियां वाले अपने ग़मों को हमारे दिल की पनाह में लाने आए, देख कर यह कैफियत हमारे अपने भी हम पर अपना हक जमाने आए, और जब कभी भी हमने खोल कर रख डाली फ़ैहरिस्त अपने ग़मों की - तो ग़ैर तो ग़ैर ही रहे, हमारे अपनों के लबों पर भी सौ सौ बहाने आए। दर्द जब कभी भी हद्द से गुज़र गया, दुनियां वाले हमें और सताने आए, ताज़ा ज़ख्मों पर मरहम तो छोड़ो, पुराने ज़ख्मों पर नमक लगाने आए, अपने कातिल की तो इक इक अदा पर कुर्बान जाने को दिल चाहता है – जो कि खुद ही क़त्ल करके खुद ही रूबरू-ए-ज़माना आंसू बहाने आए। जब कभी ज़माने के रूबरू अपनी रूदाद-ए-ग़म-ए-दिल हम सुनाने आए, तो हर किसी की जुबां पर फ़क्त अपने ही रंज-औ-ग़म के अफ़साने आए, यह तो तुम ही एक महरम हो हमारे जो कि हमारे दर्द को बांट लेते हो - वरना ये ज़माने के लोग तो मौका ब मौका हमारे गम को बढ़ाने आए।
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Tuesday, May 22, 2012
नज़म - सच और झूठ
सच क्या है, सच एक हकीकत है, सच सदा हमें सही राह दिखाता है, झूठ क्या है, झूठ एक छलावा है, झूठ सदा ग़लत राह पर लगाता है। झूठ का ऐतबार ही क्या है, झूठ तो फ़रेब है शुरुआत से आख़िर तक, झूठ ऐय्यार है, सौ भेस बदल लेता है, झूठ हमेशा मन को लुभाता है। झूठ का मन भावन रूप आदमी को इस कदर बहका देता है कि वोह, झूठ को सच और सच को झूठ साबित करने में नहीं हिचकिचाता है। सच माना कि कड़वा होता है और आसानी से हज़म नहीं होता है पर, सच का हमेशा बोलबाला होता है और वोह अपनी छाप छोड़ जाता है। सच हर हाल में फ़तेहयाब है, सच तो सच है आग़ाज़ से अंजाम तक, सच में तो सूरज का नूर समाया हुआ है, सच हमें रौशनी दिखाता है। झूठ की औकात ही क्या है, वक्ती तौर पर भले ही झूठ जीत जाए पर, सच और झूठ की लड़ाई में सच के मुकाबिल झूठ टिक नहीं पाता है।
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नज़म - पोशीदगी-ए-उल्फ़त
अफ़साने उल्फ़त हमारी के यूं चर्चा में कैसे आ गए, यह आप बेहतर जानते हैं, हमारे दिल की लगी के बाबत कैसे जान गए लोग, यह आप बेहतर जानते हैं, दिल की अदल बदल के वक्त हम दोनों ने अहद लिया था एक पोशीदगी का - पोशीदगी-ए-उल्फ़त के इस अहद को किसने तोड़ा, यह आप बेहतर जानते हैं। ज़माने की नज़रें तीर की मानिंद हमको छेदती रही, यह आप बेहतर जानते हैं, हमने सदा अपनी ज़ुबान को सात तालों में बंद रखा, यह आप बेहतर जानते हैं, हमें हमेशा यही चिंता सताती रही कि कहीं आपका नाम जग ज़ाहिर न हो जाए - पोशीदगी-ए-उल्फ़त की इस गिरह को किसने खोला, यह आप बेहतर जानते हैं। पोशीदा बातों को आपने जग ज़ाहिर क्यों होने दिया, यह आप बेहतर जानते हैं, क्यों मोहब्बत को ऐसे बदनामी का चोगा पहना दिया, यह आप बेहतर जानते हैं, आपने शायद यही सोचा होगा कि अक्सर बदनामी में भी रास्ते निकल आते हैं - और इस मसले का भी कोई कारामद हल निकल आए, यह आप बेहतर जानते हैं।
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10:21:00 AM
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नज़म - फ़सल-ए-गुल
आज घर से निकला था मैं गुलशन से फ़सल-ए-गुल को हासिल करने के लिए, गुलों की इस फ़सल की दरकार थी मुझे अपनी महबूबा को पेश करने के लिए, चंद फूल गुलाब के अगर मैं ले भी लूंगा तो गुलशन का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा - मेरी महबूबा का दिल खिल उठेगा मुझे खुद को उसपर निस्सार करने के लिए। गुल गुलशन में गुलफ़ाम बने फिरते हैं अपनी खूबसूरती के चर्चे सुनने के लिए, गुलों का यूं गुलशन में इतराना जायज़ भी है गुलशन की तशहीर करने के लिए, यह बात गुलों के दिमाग़ में घर कर गई है कि रौनक-ए-दुनियां फक्त इन्हीं से है – और बुलबुल नें भी इन्हें सर पे चड़ा रखा है खुद को जांनिस्सार करने के लिए। एक वजह यह भी है मेरे पास गुलों को अपनी महबूबा के रूबरू करने के लिए, जिस ग़ुरूर में गुल चमन में उड़ते फिरते हैं उस ग़ुरूर को फ़ना करने के लिए, ताउम्र गुल गुलशन में रहे और अपने से खूबसूरत किसी शै के कभी रूबरू न हुए - महबूबा के रूबरू लाना लाज़मी था इन्हें इनसे खूबसूरत शै के रूबरू करने के लिए।
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नज़म - हमारा प्यार
खुशियों की दौलत तुम्हें मुबारक और ग़मों का खज़ाना हमारा हो, मुनाफ़े के सब सौदे तुम्हें नसीब और घाटे का हर सौदा हमारा हो, तुम्हारी खुशियों में जब भी इज़ाफ़ा हो तो महज़ यही दुआ करना - खुशियां कुछ हमारे हिस्से में भी आ जाएं और ग़मों में खसारा हो। मोहब्बत में गिले-शिकवे बेमानी होते हैं, मानीखेज प्यार हमारा हो, रेले ग़म और खुशी के तो फ़ानी होते है, रवां फ़क्त प्यार हमारा हो, ज़माने की रंगरलियां हों या दुनियावी दौलत, ये सभी वक्ती होते हैं - बाद फ़ना इश्क के जो किस्से कहानी होते हैं, वैसा प्यार हमारा हो। प्रीत बनी रहे सभी से और सबके दिल में कायम प्यार हमारा हो, वैर और द्वैत ना हो किसी से भी और सबके साथ प्यार हमारा हो, चार दिन की यह ज़िंदगी सबके साथ प्रेम-औ-प्यार से गुज़र जाए - हर किसी की मोहब्बत का जो भूखा हो, बस वैसा प्यार हमारा हो।
Labels:
नजम
at
10:12:00 AM
Posted by
H.K.L. Sachdeva
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