जब मेरे नन्हे शौर्य के मुख पर प्यारी एक मुस्कान उभरती है, तो पत्ता पत्ता लहलहा उठता है, हवा भी गुनगुनाने लगती है, वातावरण सुरमय हो जाता है, मधुर स्वर गूंजने लगते हैं - खामोशी भी खिलखिला देती है एवं ठहाके लगाने लगती है। जब मेरे नन्हे शौर्य के मुख पर प्यारी एक मुस्कान उभरती है, कंवल दिल के खिल उठते हैं, हवा खुशगवार सी लगने लगती है, संपूर्ण सृष्टि महक उठती है एवं हर तरफ़ एक जादू फैल जाता है - खामोशी भी खिलखिला देती है और ठहाके लगाने लगती है। जब मेरे नन्हे शौर्य के मुख पर प्यारी एक मुस्कान उभरती है, बेखुदी हद्द से गुज़र जाती है, आसपास की खबर नहीं रहती है, श्वास श्वास में एक अनोखा सा, अनूठा सा अनुभव होता है - खामोशी भी खिलखिला देती है और ठहाके लगाने लगती है।
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Tuesday, May 14, 2013
कविता - मुस्कान मेरे नन्हे शौर्य की (Shaurya is my Grandson)
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5:54:00 PM
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H.K.L. Sachdeva
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Monday, January 28, 2013
कविता - कारण दामिनी की मृत्यु का
मेरे साथ जो हादसा हो गया, उससे देश की जनता के आक्रोश का तो कोई अंत ना था, मैं तो स्वयं ही दुःखी थी पर जनता को पीड़ित देख कर मेरी पीड़ा का भी अंत ना था। जनता की मुजरिमों के लिए मृत्युदंड की मांग तो जायज़ थी पर जनता का यह फैसला, देश के हुकुमुरानों, कानूनदानों और मुंसिफ़ों के लिए एक गंभीर समस्या से कम ना था। हालांकि आक्रोश की तो उनमें भी कमी न थी पर मौजूदा कानून में उनके हाथ बंधे थे, क्योंकि मौजूदा कानून में बलात्कार के जुर्म के लिए मृत्युदंड का कोई प्रावधान ना था। उनके बंधे हाथ देख मुझे क्रोध भी आ रहा था पर उनके हाल पर रहम भी आ रहा था, लेकिन अपराधियों को वांछित सज़ा ना मिल पाए यह भी मेरे मन को गवारा ना था। हालांकि मैंने अपने भाई से स्पष्ट कहा था कि मैं मरना नहीं चाहती, जीना चाहती हूं, पर बहुत ही सोच समझकर मैंने एक फैसला लिया जो कि मेरे लिए आसान ना था। मैंने रब्ब से अपने लिए मौत मांग ली और रब्ब नें मेरी मंशा समझकर मान भी ली, अब हुकुमुरानों, कानूनदानों और मुंसिफ़ों के लिए इंसाफ़ करना कोई मसला ही ना था। कारण यह कि अब तक वोह बलात्कार को ही मृत्युदंड के तराज़ू में तोलते आ रहे थे, मेरी मृत्यु से आरोपी क़त्ल के मुजरिम थे, अब उन्हें मृत्युदंड देना मुश्किल ना था।
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1:49:00 PM
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Wednesday, December 26, 2012
कविता - दामिनी के मुजरिमों की सज़ा
बलात्कार के अपराध के दोषियों लिए मात्र मौत की सज़ा ही उपयुक्त हो सकती है, इतने जघन्य कृत्य के लिए इसके अतिरिक्त और कोई सज़ा भी क्या हो सकती है, मग़र मैं एक ऐसा प्रश्न खड़ा कर रहा हूं जिसपर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है - इनकी तथाकथित मृत्यु के पश्चात इनकी अस्थियों की क्या नियति हो सकती है? ये लोग जो कि पूर्णतयः दुष्चरित्र हैं इनकी अस्थियां भी तो पवित्र नहीं हो सकती हैं, उन्हें समुद्र में प्रवाह करें तो भविष्य में वो सुनामी जैसी विपदा का रूप ले सकती हैं, उन्हें ज़मीन में गाड़ें तो भविष्य में भूकंप जैसी परिस्थितियों का जन्म हो सकता हैं - उन्हें वातावरण में विसर्जित करें तो वो सम्पूर्ण वातावरण को दूषित कर सकती हैं। अगर ऐसा सब कुछ करने से ऐसी अमानवीय परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं, ऐसी परिस्थितियां जो कि सम्पूर्ण मनुष्य जाति के लिए हानिकारक हो सकती हैं, तो उचित यही होगा कि मृत्युपरांत इनकी लाशें जंगली जानवरों को सौंप दी जाएं - मनुष्य जाति की हानि भी ना हो और ये किसी के लिए लाभकारी भी हो सकती हैं।
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12:50:00 PM
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Wednesday, October 5, 2011
कविता - कस्टमर इज़ आल्वेज़ राइट (या रौंग)
काफ़ी समय पहले एक साहब हमारे साथ बैंक में काम करते थे, नाम तो था शांतिप्रिय पर छवि "एंगरी यंग मैन" वाली रखते थे, जवान थे और हर ग्राहक से बिना किसी बात झगड़ा कर बैठते थे - "कस्टमर इज़ आल्वेज़ राइट" बैंक मैनेजर अमूमन उन्हें समझाते थे। "कस्टमर इज़ आल्वेज़ राइट" सुन सुनकर बेचारे घुटकर रह जाते थे, एक दिन अचानक उन्होंने त्यागपत्र दे दिया पर बहुत खुश दिख रहे थे, शायद कोई बेहतर और अच्छे वेतन वाली नौकरी उनको मिल गई थी - जाते जाते वोह अपने नाम के अनुरूप सबसे खुश होकर मिल रहे थे। कल एयरपोर्ट पर अचानक वो मिल गए, हमें बहुत तपाक से मिले थे, हमने उनका हालचाल पूछा और पूछा आजकल वो कहां काम करते थे, हंसकर बोले आजकल वो वहां हैं जहां "कस्टमर हमेशा रौंग ही होता है" – मुझे हैरान देखकर बोले, "आजकल वो पोलीस विभाग में काम करते थे"।
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3:47:00 PM
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H.K.L. Sachdeva
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Tuesday, February 8, 2011
कविता - काला चश्मा
देश की राजधानी में बाँब ब्लास्ट, इतने मरे, इतने घायल, ऐसा तो होता ही रहेगा, किसी डिज़ास्टर पंडित ने कहा था। "मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे बसंती चोला", क्या यह वही देश है जिसके लिए भगत ने कहा था। "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, दिल में है", क्या यह वही देश है जिसके लिए भगत ने कहा था। "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती", क्या यह वही देश है जिसके लिए भारत ने कहा था। "है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं", क्या यह वही देश है जिसके लिए भारत ने कहा था। हां, यह वही देश है, तोड़ दो इन दरिंदों के काले चश्मे को, फिर खुद कहोगे जो भगत ने कहा था और भारत ने कहा था।
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12:01:00 PM
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Thursday, July 29, 2010
कविता - एक और अभिशाप
आज फिर मखमली सी हथेलियां मेंहदी से रचाई गई, आज फिर मरमरी से इन पाओं में महावर रचाई गई, दुख-दर्द से पड़े ज़र्द चेहरे को कृत्रिम सी सफ़ेदी दे कर - आज फिर इस चेहरे पर लालिमा सूरज की रचाई गई। आज फिर ये वीरान सी आंखें काजल से सजाई गई, आज फिर इन सूखे पड़े होठों पर लाली सजाई गई, मग़र ये लब जो जाने कब से सिसकियां भर रहे थे - आज इनपे एक क्षीण सी मुस्कान भी ना सजाई गई। आज फिर सूनी पड़ी ये कलाइयां चूड़ियों से सजाई गई, आज फिर उजड़ी पड़ी मांग सिंदूर के रंग से सजाई गई, सती-प्रथा के हामी समाज के ठेकेदारों के इसरार पर - आज फिर एक विधवा पति की चिता पर बिठाई गई।
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5:51:00 PM
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कविता - एक अभिशाप
यह हाथ जो आज पत्थर ढो रहे हैं मेंहदी इन हथेलियों में रचा देते तो क्या था, पत्थरों और कांटों से उलझते हुए इन पाओं में भी महावर रचा देते तो क्या था, लेकिन यह चेहरा जो ज़माने की तानाज़नी और छींटाकशी से ज़र्द हो गया वरना - इस चेहरे में आफ़ताब की रौशनी और चांद की चांदनी को रचा देते तो क्या था। इन मुंतज़िर आंखों को यदि रात की कालिमा के काजल से सजा देते तो क्या था, वक्त की मार से पीले पड़े इन होठों पे सूरज की लालिमा सजा देते तो क्या था, लेकिन तकदीर-औ-तदबीर की कशमकश के मारे ऐसा कुछ भी न हो सका वरना - सिसकियां भरते हुए रूखे लबों पे खुशियों की मुस्कान जो सजा देते तो क्या था। चूड़ियों की खनक को भूली हुई कलाइयों में फिर चूड़ियां सजा देते तो क्या था, इस हसीन दोशीजा को ज़ेवरात-औ-आभूषणों से फिर से सजा देते तो क्या था, पर समाज के ये ठेकेदार विधवा-विवाह को आज भी अभिशाप कहते हैं वरना - सुनसान सड़क की तरह दिखती इस मांग को सिंदूर से सजा देते तो क्या था।
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9:39:00 AM
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Wednesday, June 23, 2010
Tuesday, June 15, 2010
कविता - ग़रीबी रेखा
ग़रीबी रेखा से एक सीमा निर्धारित होती है ग़रीबों के निवास के लिए, इसके ऊपर का स्थान आरक्षित है केवल अमीरों के निवास के लिए, इस पर लगी एक तख़्ती के दोनों ओर "प्रवेश निशेध" लिखा होता है - ऊपर ग़रीबों के जाने पर रोक है और नीचे अमीरों के आने के लिए। सदियों से यह प्रथा चली आई है केवल ग़रीबों के अनुसरण के लिए, ग़रीब रेखा लांघ भी जाएं तो टिक नहीं पाते अपने संस्कारों के लिए, अमीर तो इसके ऊपर प्रसन्न हैं नित नए बदलते संस्कारों के चलते - निर्धारण रेखा का हो या संस्कारों का, सब बंदिशें हैं ग़रीबों के लिए। हां, कोई बंदिश नहीं अमीरों पर इसके ऊपर और ऊपर जाने के लिए, व कोई बंदिश नहीं ग़रीबों पर भी इसके नीचे और नीचे जाने के लिए, ग़रीबी-औ-अमीरी में फ़ासला मैंने बढ़ते हुए तो देखा है घटते हुए नहीं - दोनों ही परिस्थितियां दृढ़ हैं अपने स्थान पर सीमा पालन के लिए। वैसे तो ये बंदिशें सुदृढ़ हैं अपने अपने स्थान पर स्थाई तौर के लिए, किसी के लिए भी कोई गुंजाइश नहीं है इधर से उधर जाने के लिए, पर यदि कोई भाग्य से सीमा रेखा के इधर या उधर निकल जाता है - तो ग़रीब हो या अमीर वहीं का होकर वोह रह जाता है सदा के लिए।
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8:56:00 AM
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H.K.L. Sachdeva
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Wednesday, June 9, 2010
Wednesday, March 24, 2010
Sunday, February 21, 2010
Monday, February 15, 2010
Sunday, February 7, 2010
Friday, December 19, 2008
Friday, November 14, 2008
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