बहुत रोका, बहुत टोका मैंने अपनी कलम को पर वोह अपनी करनी से बाज़ नहीं आई, किस्सा-ए-हकीक़त-ए-हाज़िरा को ज़माने में आम करने में उस ने ज़रा भी देर नहीं लगाई, पूरे का पूरा हर्फ़-ए-अमल वोह फ़र्राटे से लिखती आई और ज़रा भी बुज़दिली नहीं दिखाई, पर ज़माने मे चोरी, लूट, खसोट, बदमाशी, गुंडागर्दी व दहशतगर्दी मे कोई कमी नहीं आई। चोर हो, भाई हो या नेता, आपस में सभी एक हैं, यह लिखने में वोह ज़रा भी नहीं घबराई, इस ज़माने में कोई भी इदारा ले लो, इन सभी कुकृत्यों से अछूता वोह ज़रा भी नहीं पाई, ज़माने की जुबान पर ताले लगे हैं तो क्या, कलम नें अपनी कथनी में कमी नहीं दिखाई, जो चोर और पोलीस आपस में हैं भाई भाई, नेता व भाई के रिश्ते में भी कमी नहीं आई। सुनो, कान खोलकर, सुनो, यह आवाम की ही पुरज़ोर आवाज़ है जो कलम नें है यहीं उठाई, देखो, आंखें खोलकर, देखो, शीशे में तुम्हारी अपनी ही सूरत है जो कलम नें है यहीं दिखाई, बोलो, मुहं खोलकर, बोलो, यही तो हकीकत-ए-हाज़िरा है जो कलम नें तुम्हें है यहीं समझाई, बापू के तीन बंदर ही बनकर मत रह जाओ वरना कहोगे कि तुमने है मुंह की यहीं खाई।
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Saturday, December 8, 2012
नज़म - मेरी कलम
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4:09:00 PM
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H.K.L. Sachdeva
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नज़म - आप मिलो तो सही
साथ आपका अगर रहे तो दोंनों जहां हम भुला देंगे, आप मिलो तो सही, इस जहां के अंदर ही इक नया जहां हम बसा लेंगे, आप मिलो तो सही। ज़िंदगी के सफ़र में एक हमसफ़र का साथ होना निहायत ही लाज़मी है, हमसफ़र बन जाओ, आपको दिल में हम सजा लेंगे, आप मिलो तो सही। आप अगर साथ देने का वादा करो तो फिर इस ज़माने का हमें क्या डर, तमाम दुनियां की मुखालफ़त झेलकर हम भुला देंगे, आप मिलो तो सही। वफ़ा परस्ती हमारा शोबा और इकरार-ए-वफ़ा शौक़ आपका तो क्या ग़म, ग़ैरों से हमें मतलब क्या, एक दूजे से हम निभा लेंगे, आप मिलो तो सही। सादादिली हमारी तो जगज़ाहिर है, यह एक ही नज़र में आप जान जाओगे, आंखों ही आंखों में बात दिल की आपको हम बता देंगे, आप मिलो तो सही। एक बहुत ही मशहूर कहावत है जग में कि एक हाथ दूसरे हाथ को धोता है, आप और हम दोनों मिल जाएं तो सब ग़म मिटा देंगे, आप मिलो तो सही। लबों पर हो आराइश हंसी की और फूलों की मानिंद मुस्कुराहट हो चेहरे पर, फिर देखो, आपकी खातिर जान तक भी हम लुटा देंगे, आप मिलो तो सही।
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4:05:00 PM
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H.K.L. Sachdeva
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नज़म - रूदाद-ए-ग़म-ए-दिल
मुद्दतों दुनियां वाले अपने ग़मों को हमारे दिल की पनाह में लाने आए, देख कर यह कैफियत हमारे अपने भी हम पर अपना हक जमाने आए, और जब कभी भी हमने खोल कर रख डाली फ़ैहरिस्त अपने ग़मों की - तो ग़ैर तो ग़ैर ही रहे, हमारे अपनों के लबों पर भी सौ सौ बहाने आए। दर्द जब कभी भी हद्द से गुज़र गया, दुनियां वाले हमें और सताने आए, ताज़ा ज़ख्मों पर मरहम तो छोड़ो, पुराने ज़ख्मों पर नमक लगाने आए, अपने कातिल की तो इक इक अदा पर कुर्बान जाने को दिल चाहता है – जो कि खुद ही क़त्ल करके खुद ही रूबरू-ए-ज़माना आंसू बहाने आए। जब कभी ज़माने के रूबरू अपनी रूदाद-ए-ग़म-ए-दिल हम सुनाने आए, तो हर किसी की जुबां पर फ़क्त अपने ही रंज-औ-ग़म के अफ़साने आए, यह तो तुम ही एक महरम हो हमारे जो कि हमारे दर्द को बांट लेते हो - वरना ये ज़माने के लोग तो मौका ब मौका हमारे गम को बढ़ाने आए।
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H.K.L. Sachdeva
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Sunday, February 13, 2011
नज़म - ज़मीन पे फ़िरदौस
तमन्ना यही है दिल में अपने कि उतार लाएं ज़मीन पे फ़िरदौस एक, चार सू खुशियों का आलम हो और बन जाए ज़मीन पे फ़िरदौस एक। नज़र-ए-इनायत हो उसकी और हर नियामत मयस्सर हो यहीं पर, इंसां रहे पल पल उसी की बंदगी में पा जाए ज़मीन पे फ़िरदौस एक। ना हों बंदिशें मज़हब की और ना ही हों मसाइल दुन्यावी रिवायतों के, फ़रिश्ते खुद उतरें अर्श से और देखने आएं ज़मीन पे फ़िरदौस एक। खुलासा जन्नत का फ़क्त दो अलफ़ाज़ में ही बयां करना हो मुमकिन, "आपसी मेल-जोल" कायम रहे और बन जाए ज़मीन पे फ़िरदौस एक। मौजूद हो इस ज़िंदगी में फ़क्त "जियो और जीने दो" का फ़ल्सफ़ा, यही अगर लोग समझ जाएं तो उतर आए ज़मीन पे फ़िरदौस एक। आसमान से खुद खुदा देखे अपनी कायनात पर जन्नत के नज़ारे, करके बारिश अपनी रहमतों की दिखाए ज़मीन पे फ़िरदौस एक।
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1:00:00 PM
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H.K.L. Sachdeva
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